Thursday, April 30, 2009

बाबूजी शहर में आ के गाँव की मिटटी भूल गए ........


बाबूजी तुम शहर में आ के , गाँव की मिट्टी भूल गए ,
पढ़े लिखे पर कुछ नही सीखे , सारे गुण तुम भूल गए | बाबूजी तुम शहर में ........

गिल्ली डंडा , पतंग और धप्पा , बच्चों को है नही पता ,
मेला , गणगोर और माता पूजा , बच्चों को है नही पता ,
सुबह उठना भूल गए , और पूजा करना भूल गए | बाबूजी तुम शहर में ........

थाली - पीठ , आमाडी की भाजी , दीवाली के शक्करपारे ,
दशहरे में घर घर जाना, थैली में बिस्किट केले लाना ,
हाय, हल्लो , गुडमार्निंग में , पैर छुना भूल गए | बाबूजी तुम शहर में .........

वीरपोस पर गेहू ले जाना , पेट भरा हो तो भी खाना ,
दीवाली में भाईबिज आए , बहने खाना खाने बुलाये ,
दूर दूर के चक्कर में अब , वीरपोस भाईबिज भूल गए | बाबूजी तुम शहर में ........


बीबी तुम्हारी सर पर बैठी , लड़का - लड़की भी हवा में उड़ रहे ,
गाव में आने का नाम नही लेते, सारे ही तुम बिगड़ गए
माँ तुम्हारी रोती है पर , माँ को तुम कभी याद ना करते | बाबूजी तुम शहर में ........

पंक्ति में खाने को जाना , सभी काम में हाथ बटाना,
जाकर सब को मिलना जुलना , सभी को आना कहकर आना ,
बुफे बुफे की चका चोंध में , बैठ के खाना भूल गए | बाबूजी तुम शहर में .........

समय बदला लड़की बदली , जीन्स पहने वो फटी फटी ,
लड़की बाल कटाकर कर रखे , लड़का रखे पीछे चोटी ,
बच्चे बहुत पढ़ रहे है पर , संस्कार सारे भूल गए | बाबूजी तुम शहर में ........

दादी का वो लोरी गाना , बिस्तर पर कहानी सुनाना,
दादी की वो चिडी बाई , भूल गए तुम मेरे भाई ,
हर एक साल में एक बार तुम , आना जाना भूल गए | बाबूजी तुम शहर में .......

होटल में यूँ खाना खाना , मलाई कोफ्ता ,पनीर खाना ,
यह नही जमता , वो नही जमता ,बात बात में नखरा बनाना ,
छत पे बैठकर ,साथ बैठकर , खिचडी खाना भूल गए |बाबूजी तुम शहर में ........

ब्रेड , सेंडविच , पेटिस खाना , धानी , परमल अब नहीखाना ,
दूध , दही ना मक्खन खाना , भूल गए तुम छाछ बनाना ,
खेत में जाना , आम चूसना, उम्बी ,वानी भूल गए |बाबूजी तुम शहर में .....

श्लोक , दोहा , छंद ,सोरठा , होता क्या है पूछो तो ,
रामायण , हनुमान चालीसा , आती है क्या पूछो तो ,
फिल्मी गाने याद है पर , मन्त्र वंत्र सब भूल गए | kबाबूजी तुम शहर में .....

टेलीविजन के युग में हम , भूल गए अखबार को ,
अददा, पोना आता नही है , भूल गए हम पहाडो को ,
केलकुलेटर के चक्कर में ,हिसाब हाथ का भूल गए |बाबूजी तुम शहर में ......

भोरी , कंची, गोगलगाय , देर से आओं तो डांटे माँ ,
सितोलिया , छुआछाई , लंगडी , याद आए हमें आए हमें घड़ी -घड़ी ,
कंप्यूटर के युग में हम वो , सत्ती -सेंटर भूल गए | बाबूजी तुम शहर में .......

काम काम में गाड़ी ले जाना , बगेर गाड़ी के कही नही जाना ,
बच्चो को भी गाड़ी चाहिए , काम तुम्हारा नही तो भाड़ में जाए ,
गाड़ी घोडो के चक्कर में अब , पैर चलाना भूल गए | बाबूजी तुम शहर में .......

माँ की अब नही सुनते , बीबी कहती है करते है वो ,
पिताजी की अब नही सुनते , मन में आता है करते है वो
बीबी ,बच्चो के चक्कर में अब , माँ ,बाप को भूल गए | बाबूजी तुम शहर में ....

बीबी से अब काम नही होता , सर दुखाती है थोड़ा काम हो ,
पति अब बोलते नही है , बच्चे अब सुनते नही है ,
नौकरों के युग में अब सब , काम हाथ से करना भूल गए | बाबूजी तुम शहर में ........

चिमटी भरती पहले माँ , काम ग़लत हो तो झापट खा ,
बच्चे अब उतमा गए है, माँ -बाप सुस्ता गए है ,
लाड -प्यार के चक्कर में अब , चिमटी ,झापट भूल गए |बाबूजी तुम शहर में .....

कूलर बगेर नीद नही आए , हाथ का पंखा अब नही भाए,
बच्चो को एसी चाहिए , एसी बगेर सर दुखाये ,
कूलर, एसी के चक्कर में अब , छत पे सोना भूल गए | बाबूजी तुम शहर में .....

कहाँ जा रहा है यह बता , माँ हमेशा यह कहती थी ,
कहाँ से आ रहा है यह बता , माँ हमेशा यह पूछती थी ,
बिना कहे आना -जाना , माँ से कहना सुनना भूल गए | बाबूजी तुम शहर में .....

मेरी बीबी मेरे बच्चे , अब हम सब इतने ही है ,
अपना ये और अपना वो ,अब हम सब इसीमे है ,
अपने अपने के चक्कर में अब , प्रेम से रहना भूल गए |बाबूजी तुम शहर में ......

बस्ता भारी और किताबे छे , शिक्षा का कोई नाम नही है
पेंसिल ,रबर के चक्कर में अब ,पट्टी ,पेम का काम नही है ,
कोचिंगो के चक्कर में अब , ख़ुद से पढ़ना भूल गए | बाबूजी तुम शहर में .......

लिम्का,पेप्सी, कोकाकोला , पिने लग गए अब सब ये ,
कुल्फी और नीबू का शरबत , खो गए अब सब ये ,
कोलद्द्रिंक के चक्कर में अब , दूध पीना भूल गए | बाबूजी तुम शहर में .......

घोड़ा बादाम खाए पीछे देखे मार खाए , यहाँ पर बांधू भैस और यहाँ पर बांधू गाय ,
गोल-गोल घानी इतना -इतना पानी , इतना नामक खायगा और इतना मिर्च खाय ,
राजा गोप गुप्क्काम्दास , यह सब अब हम भूल गए | बाबूजी तुम शहर में ........

किसी से अब नही मिलाना जुलना , बीबी बच्चे ही प्यारे है ,
अपने चार और अपनी कार ,इनके लिए ही वारे- न्यारे है ,
अपनी रोटी सेकने में अब , मिलाना -जुलना भूल गए | बाबूजी तुम शहर में .......

एक ,दो ,तिन ,चार , याद है तुमको गिनती वो ,
एक एकम एक , दो दुनी चार , याद है तुमको पहाडे वो ,
अंग्रेजी के चक्कर में अब , अपनी गिनती भूल गए |बाबूजी तुम शहर में

3 comments:

  1. मंगलवार 23/04/2012को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं ....

    आपके सुझावों का स्वागत है ....
    धन्यवाद .... !!

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    1. आपने लिखा....हमने पढ़ा
      और भी पढ़ें;
      इसलिए आज 23/04/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
      पर (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में)
      आप भी देख लीजिए एक नज़र ....
      धन्यवाद!

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